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सड़क हादसे में मृत वकील के परिवार को राहत, मुआवजा 72.67 लाख से बढ़ाकर 1.01 करोड़

➤ हिमाचल हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में मृत युवा वकील के परिवार का मुआवजा बढ़ाकर करीब 1.01 करोड़ रुपये किया

➤ अस्थायी रजिस्ट्रेशन की अवधि खत्म होने के बाद बिना वैध आरसी वाहन चलाना बीमा शर्तों का मूलभूत उल्लंघन

➤ बीमा कंपनी पहले करेगी मुआवजे का भुगतान, बाद में वाहन मालकिन से राशि वसूलने का अधिकार


हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सड़क हादसे में जान गंवाने वाले युवा वकील के परिवार को बड़ी राहत देते हुए मुआवजे की राशि 72.67 लाख रुपये से बढ़ाकर करीब 1.01 करोड़ रुपये कर दी है। अदालत ने साथ ही स्पष्ट किया कि अस्थायी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने के बाद वैध पंजीकरण प्रमाणपत्र (आरसी) के बिना सार्वजनिक सड़क पर वाहन चलाना मोटर वाहन अधिनियम का गंभीर उल्लंघन है और इसे बीमा पॉलिसी की शर्तों का मूलभूत उल्लंघन माना जा सकता है। अदालत ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह पहले पीड़ित परिवार को मुआवजे का भुगतान करे और इसके बाद ‘पे एंड रिकवर’ के सिद्धांत के तहत यह राशि वाहन की मालकिन से वसूल सकती है।

न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की अदालत ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की ओर से वर्ष 2014 में दायर अपील और मृतक की मां की ओर से दायर क्रॉस-ऑब्जेक्शन पर सुनवाई करते हुए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण, चंबा के वर्ष 2013 के आदेश में संशोधन किया। इस फैसले में अदालत ने एक ओर मृतक के परिवार को मिलने वाले मुआवजे में वृद्धि की, वहीं दूसरी ओर वाहन के पंजीकरण और बीमा पॉलिसी की शर्तों से जुड़े कानूनी पहलुओं को भी स्पष्ट किया।

खजियार-डलहौजी मार्ग पर हुआ था दर्दनाक हादसा

मामला 22 जुलाई 2011 का है। खजियार-डलहौजी मार्ग पर दैनकुंड नाले के पास एक कार अनियंत्रित होकर गहरी खाई में गिर गई थी। इस हादसे में कार में सवार 27 वर्षीय अंकित महाजन की मौके पर ही मौत हो गई थी। अंकित मुंबई की एक प्रसिद्ध लॉ फर्म में वकील के तौर पर कार्यरत थे। उनके असमय निधन से परिवार को गहरा आघात पहुंचा।

हादसे के बाद मृतक की मां ने मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण, चंबा में याचिका दायर की थी। न्यायाधिकरण ने वर्ष 2013 में अपने आदेश के तहत परिवार को 72,67,700 रुपये मुआवजा देने का फैसला सुनाया था। उस समय मुआवजे की पूरी देनदारी बीमा कंपनी पर डाल दी गई थी। इसके बाद बीमा कंपनी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए वर्ष 2014 में हाईकोर्ट में अपील दायर की, जबकि मृतक की मां ने भी मुआवजे से संबंधित क्रॉस-ऑब्जेक्शन दाखिल किया।

अस्थायी रजिस्ट्रेशन खत्म होने के बाद भी नहीं हुआ था स्थायी पंजीकरण

मामले में वाहन के पंजीकरण की स्थिति अहम कानूनी मुद्दा बनकर सामने आई। संबंधित कार 10 जून 2011 को खरीदी गई थी। इसका अस्थायी पंजीकरण 9 जुलाई 2011 को समाप्त हो चुका था, जबकि दुर्घटना 22 जुलाई 2011 को हुई। यानी हादसे के दिन वाहन का स्थायी पंजीकरण नहीं हुआ था।

हालांकि, वाहन की मालकिन ने 19 जुलाई को क्षेत्रीय लाइसेंसिंग प्राधिकरण (आरएलए), चंबा में पंजीकरण से संबंधित दस्तावेज जमा कराए थे, लेकिन दुर्घटना के समय तक स्थायी पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ था। अदालत के सामने यही तथ्य महत्वपूर्ण रहा कि दस्तावेज जमा कराने और वैध पंजीकरण प्रमाणपत्र प्राप्त होने के बीच कानूनी अंतर है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अस्थायी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने के बाद वैध पंजीकरण के बिना सार्वजनिक सड़क पर वाहन चलाना मोटर वाहन अधिनियम का गंभीर उल्लंघन है। अदालत ने इसे बीमा पॉलिसी की शर्तों के मूलभूत उल्लंघन के रूप में देखा। इस निष्कर्ष का बीमा कंपनी की देनदारी और उसके बाद राशि की वसूली के अधिकार पर सीधा असर पड़ा।

पहले परिवार को भुगतान, फिर वाहन मालकिन से वसूली

हाईकोर्ट ने मामले में ‘पे एंड रिकवर’ का सिद्धांत लागू करते हुए बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह पहले दावेदार को निर्धारित मुआवजे का भुगतान करे। इसके बाद बीमा कंपनी को यह राशि वाहन की मालकिन से वसूलने का अधिकार होगा।

इस व्यवस्था का उद्देश्य मुआवजे के हकदार परिवार को भुगतान के लिए अनावश्यक इंतजार से बचाना है, जबकि बीमा कंपनी के कानूनी अधिकारों को भी सुरक्षित रखा जाता है। इस मामले में अदालत ने वाहन के पंजीकरण से जुड़ी स्थिति को ध्यान में रखते हुए बीमा कंपनी और वाहन मालकिन के बीच अंतिम वित्तीय जिम्मेदारी के सवाल को अलग तरीके से निर्धारित किया।

72.67 लाख से बढ़ाकर करीब 1.01 करोड़ रुपये हुआ मुआवजा

मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू मुआवजे की राशि में वृद्धि है। मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण, चंबा ने मृतक की मां को 72,67,700 रुपये देने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने क्रॉस-ऑब्जेक्शन पर विचार करते हुए इस राशि को बढ़ाकर लगभग 1.01 करोड़ रुपये कर दिया।

इस तरह अदालत के फैसले से मृतक के परिवार को मिलने वाले मुआवजे में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। साथ ही, इस निर्णय ने यह भी स्पष्ट किया कि सड़क दुर्घटना के मुआवजे से जुड़े मामलों में पीड़ित परिवार को राहत देने और बीमा पॉलिसी की शर्तों के उल्लंघन से जुड़े कानूनी दायित्वों पर अलग-अलग विचार किया जा सकता है।

हिमाचल हाईकोर्ट का यह फैसला सड़क दुर्घटना मुआवजे, वाहन पंजीकरण और बीमा कंपनी की जिम्मेदारी से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण है। यह वाहन मालिकों के लिए भी एक जरूरी संदेश है कि अस्थायी पंजीकरण की अवधि समाप्त होने के बाद वैध पंजीकरण के बिना वाहन को सार्वजनिक सड़क पर नहीं चलाना चाहिए।